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मैकॉले का अभियान सौ वर्ष के अंदर इंडिया के कोने-कोने तक पहुंचा

भारत स्वाभिमान मुरादाबाद                                                                  ॐ                                                                  १५-२-२०१२  

आभार: आइ बी टी एल 
पिछले लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह एकमात्र नेता थे जिन्होंने भाषा के प्रश्न को अपने चुनाव घोषणा-पत्र में रखा। जिस तरह दूसरे उन पर टूट पड़े, उससे दिखा कि भाषा-संस्कृति के प्रति कुशिक्षा कितनी गहरी जड़ जमा चुकी है। जब कोई दासता सहज स्थिति बन जाए तो वह कष्टकर नहीं लगती। भारतवासियों के लिए लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा-नीति का यही लक्ष्य था। उसने भारत को सहज पराधीन बनाना चाहा था, उसी के शब्दों में: ‘सचमुच दमित राष्ट्र’ (ट्रूली डॉमिनेटेड नेशन)।

अपनी भाषा से विलगाव ही इस उद्देश्य का सटीक उपाय था। मैकॉले के शब्द थे- ‘अगर आप एक ऐसी युवा पीढ़ी उत्पन्न करना चाहते हैं, जो न केवल अपनी अस्मिता और विरासत से अनभिज्ञ हो, बल्कि उसके प्रति गहरी हिकारत की भावना रख सके, तब उसे संस्कृत की शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि वह एक ऐसी भाषा है, जो एक भारतीय को अपनी सशक्त परंपरा और विशिष्ट अस्मिता के प्रति सचेत करती है। उसे अंग्रेजी की शिक्षा दी जानी चाहिए, जिसके माध्यम से वह पश्चिमी मूल्यों में दीक्षित हो सके।’
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राजीव दीक्षित : अंग्रेजी कोई बड़ी भाषा नहीं है, केवल १४ देशों में चलती है जो गुलाम रहे हैं
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ध्यान दें, मैकॉले ने हमें अंग्रेजी पढ़ाने पर उतना बल नहीं दिया था जितना संस्कृत और अपनी भाषाओं से अलग करने पर। वह भाषा की भूमिका समझता था। यह मर्म भी कि भारतीयता की आत्मा संस्कृत में बसती है। इसलिए जो भारतीय अपनी भाषा से कटा, उसे आत्म-हीन बनाना बहुत सरल हो जाएगा। यहां तक कि समय के साथ ऐसे भारतीयों में अनेक को भारत-विरोधी बनाना भी संभव हो जाएगा।

इस बात को हमारे अनेक मनीषी और नेता भी समझते थे। इसीलिए उनके लिए लक्ष्य अपनी भाषा में काम करने का था, अंग्रेजी बहिष्कार का नहीं। श्रीअरविंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, सुभाषचंद्र बोस, गांधी, सरदार पटेल, राजाजी, मुंशी, महादेवी, शंकर कुरुप आदि महापुरुषों ने बल दिया था कि हर भारतीय की पहली और सिद्ध भाषा उसकी मातृभाषा हो। तभी वह सच्चे अर्थ में शिक्षित होगा। उनके लिए हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाए रखने का आग्रह उसी का दूसरा पहलू था, कोई विलग बात नहीं।

अगर हमारे अंग्रेजीदां बौद्धिक आज इन बातों को सुनना भी नहीं चाहते, तो वे मैकॉले को बार-बार सही साबित कर रहे हैं। वे बौद्धिक और उनकी नकल करने वाले हिंदी रेडिकल भी एक कृत्रिम, संकीर्ण दुनिया में रहते हैं। इसीलिए वे नहीं देख पाते कि भारत में पश्चिमी मानसिकता का दबदबा और हिंदू-विरोधी बौद्धिकता जितनी सशक्त आज है, उतनी ब्रिटिश राज में कभी न रही। हमारे उच्च-वर्ग के बौद्धिक प्रतिनिधि अपने ही देश के धर्म, शास्त्र, साहित्य और परंपराओं के प्रति दुराग्रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘तीन सौ रामायण’ से संबंधित विवाद इसका नवीनतम प्रमाण है।

अंग्रेजी के एकाधिकार से ही विचार-विमर्श में सामान्य जनगण की इच्छा, भावना आदि का बहिष्कार सहजता से होता है। अंग्रेजी में ‘सार्वजनिक’ विमर्श वैसा ही है, जैसे शीशे के केबिन में बोल कर बाहर लोगों को संबोधित करना। आधुनिक दार्शनिक हाइडेगर ने कहा भी था- ‘हर भाषा उन लोगों के इर्द-गिर्द, जो उसे बोलते हैं, एक जादुई घेरा खींच देती है।’ ऐसे ही एक संकीर्ण घेरे में रहते हुए हमारे बुद्धिजीवी पूरे देश को जानने का भ्रम पालते हैं।

भाषा कोई मोटरकार-सी निर्जीव उपयोगी वस्तु नहीं। भाषा में संस्कृति अनिवार्यत: समाहित होती है। जब आप एक भाषा छोड़ते हैं तो उसकी संस्कृति भी छोड़ते हैं। किसी पराई भाषा में बात कहते हैं तो उस भाषा के आग्रह आपके विचारों को मोड़ने, अनुशासित करने लग जाते हैं। इसीलिए कोई भारतीय अंग्रेजी-भाषी बन कर जनता से ‘ऊपर’ ही हो सकता है, उसके साथ नहीं। यही उसका आकर्षण भी है और भारी सीमा भी। अंग्रेजी सीखने-बोलने की मारा-मारी ज्ञान और विवेक पाने के लिए नहीं हो रही है।

यह भी सर्वाधिक झूठी बातों में एक है कि अंग्रेजी भारत के विभिन्न लोगों को जोड़ती है। उससे भी बड़ी झूठी बात यह है कि अंग्रेजी के बिना अखिल भारतीय संवाद नहीं हो सकता। अभी अण्णा हजारे ने इसे फिर दिखाया कि अंग्रेजी को छोड़ कर ही वास्तविक जन-संवाद हो सकता है। अंग्रेजी की भूमिका तो कहानी के बंदर जैसी है जो पंच बन कर बिल्लियों की रोटियां उड़ाती है। वह भारत के अंग्रेजी-भाषी उच्च-वर्ग से शेष ‘नीचे वालों’ को, फिर उन्हें एक-दूसरे से अलग-थलग कर, असहाय बना कर और हीनता की भावना भर कर वास्तव में तोड़ती है।

इन टूटने वालों में वे भी हैं जो अंग्रेजी लिखते-बोलते हैं, पर अच्छी नहीं। इसलिए भारतीय शिक्षित वर्ग में अंग्रेजी आत्मविश्वास से अधिक एक हीन-भावना, देशवासियों से लगाव के बदले विलगाव और ईर्ष्या-द्वेष से युक्त प्रतियोगिता पैदा करती है। ऐसी चूहा-दौड़, जिसमें देश की कीमत पर स्वार्थ सर्वोपरि होता है। अंग्रेजी की लालसा में सभी भारतीय भाषाओं की हालत पतली हो रही है। उसके साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना की भी।

युवाओं में अंग्रेजी भाषी बनने की लालसा दरअसल दूसरों से ऊपर और प्रभावशाली होने की लालसा है। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले भी इसी लालसा से भारतीय समाज के तुच्छ तत्त्वों ने अंग्रेजी के प्रति अधिक उत्साह दिखाया था। यह रोचक सत्य ब्रिटिश अधिकारी और विद्वान जी लीटनर ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट (१८८३) में नोट किया था। यहां अंग्रेजी शिक्षा आरंभ से ही ज्ञानवान बनने, बनाने की नहीं, बल्कि किसी तरह शासन में कोई स्थान पाकर रौबदार बनने की थी। उसी मनोवृत्ति का विकास होते-होते स्थिति यह बन गई कि स्वतंत्र भारत में भी अंग्रेजी से दूर भारतवासी स्वत: हीन समझा जाता है।

अगर अंग्रेजी देश के हजारों युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में, देश-विदेश में पैसे वाले पदों पर स्थापित कराती है तो लाखों प्रतिभाओं को घुटने, छीजने, नष्ट होने के लिए भी छोड़ देती है। सरल गणित में कहें तो वह हजार देकर लाख छीन रही है। सबसे घातक बात यह है कि अंग्रेजी वर्चस्व हमारे शिक्षित वर्ग को अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्म से विमुख बनाता है। दूसरी ओर, विशाल जन-गण को स्वत्वहीन, निर्बल, मूक बना कर छोड़ देता है। अगर इस अपरिमित हानि की चर्चा नहीं होती, तो इसलिए क्योंकि विचार-प्रचार-शासन की संपूर्ण प्रणाली पर आंग्लभाषियों का विशेषाधिकार है। उनका, जो दासता के प्रतियोगी हैं।

प्रश्न यह है कि क्या हम भारत को अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अरब आदि देशों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला एक अघोषित मानव-कारखाना बनाना चाहते हैं, जो उनके शोध संस्थानों से लेकर हॉलीवुड और झाड़ू-बर्तन, सफाई तक के लिए हर तरह के साधन और ‘मानव संसाधन’ मुहैया करता रहे? चाहे इधर खुद भारत के सामान्य लोग भ्रष्टाचार, बाढ़, सूखा, गंदगी, अपराध से लेकर नक्सलवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, सीमाओं के संकुचन जैसी हर विभीषिका के समक्ष असहाय होकर विनष्ट होने के लिए छोड़ दिए जाएं।

‘सिलिकन वैली’ और विदेशों में उद्योग-व्यापार में भारतीय ‘उपलब्धियों’ पर गर्व करने वालों ने क्या कभी सोचा है कि जो भारतीय युवा अंग्रेजी-प्रवीण होते हैं, आमतौर पर उनकी इच्छा कैलिफोर्निया जाकर काम करने की हो जाती है? वही इच्छा धीरे-धीरे, देश-बदल करके अमेरिकी नागरिक बन जाने की भी हो जाती है। इस प्रकार एक भारतीय बालक भारत के संसाधनों का उपयोग कर केवल अंग्रेजी की बदौलत आखिरकार एक विदेशी होकर रह जाता है।इस प्रकार, यहां अंग्रेजी वर्चस्व ने केवल भारतीय युवाओं को प्राय: संस्कृतिहीन और समाज-विमुख बनाया है।

देश की समस्याओं को इस अर्थ में बढ़ाया है कि हमारी सर्वोत्तम प्रतिभाएं या तो विदेश चली जाती हैं या आंतरिक दुर्व्यवस्था का शिकार या उपेक्षित होकर खत्म हो जाती हैं। अन्यथा ठीक यही लोग देश की सभी समस्याओं के समाधान में जुटते। फूट डालो-राज करो के नए, अदृश्य संस्करण के रूप में विभिन्न भारतीय भाषा-भाषियों में आपसी दूरी को बढ़ाया है। विदेशियों द्वारा भारत के एक संकीर्ण आंग्लभाषी वर्ग के माध्यम से संवाद के कारण हम बाहरी दुनिया से और बाहरी दुनिया संपूर्ण भारत से कट गई है।

कृपया इस पर गंभीरता से ध्यान दें, अंग्रेजी के माध्यम से दुनिया से जुड़ने की बात कही जाती है। लेकिन ठीक उसी कारण से वास्तव में हमसे दुनिया कट गई है! किसी विषय में दुनिया भर की सर्वश्रेष्ठ नई पुस्तकें भारत में किसी भाषा में उपलब्ध नहीं होतीं- अंग्रेजी में भी नहीं। क्यों?क्योंकि हमारे उच्च वर्ग के लोग समझते हैं कि यहां ज्ञान-विमर्श की भाषा अंग्रेजी है, इसलिए भारतीय भाषाओं में नवीनतम विश्व ज्ञान, विमर्श को रूपांतरण करने का कोई उद्योग जरूरी नहीं। दूसरी ओर, चूंकि वास्तव में अंग्रेजी में यहां कोई जन-व्यापक अध्ययन नहीं होता, हो ही नहीं सकता, इसलिए (सस्ते उपन्यासों को छोड़ कर) दुनिया भर में अंग्रेजी में लिखित, अनूदित नए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, लेखन भारत में आते ही नहीं।

सच तो यह है कि अंग्रेजी में उपलब्ध नया विश्व साहित्य भी भारत के बाजार में उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि उसका कोई लाभकारी बाजार नहीं है। केवल इक्का-दुक्का, किसी कारण विख्यात या विवादस्पद पुस्तकें ही भारत की अंग्रेजी किताबों की दुकानों में मिल पाती हैं। यही इसका सबसे भयावह प्रमाण है कि अंग्रेजी के कारण किस तरह हम दुनिया से, और दुनिया हमसे कट गई है। विशेषकर विचार-विमर्श और विद्वत-चर्चा के ही क्षेत्र में।

दूसरी ओर, अंग्रेजी के पीछे बरसों, दशकों मगजपच्ची करने के कारण ही हमारे युवा अपनी भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को जानने से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार, अंग्रेजी के प्रति युवाओं में ललक बढ़ाना अपने अंतिम परिणाम में एक ओर तो उनके वास्तविक ज्ञान को अतिसीमित कर डालता है। दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्र, संस्कृति, खुशहाली, एकता और सामाजिक सौमनस्य के लिए भी घातक हो जाता है।

लेकिन आज देश के अधिकतर शिक्षित लोग इन बातों पर विचार भी नहीं करते। यह इसका प्रमाण है कि भारत का शिक्षित वर्ग अपनी जनता, संस्कृति और ज्ञान की अभिलाषा से दूर हो चुका है। मैकॉले का अभियान सौ वर्ष के अंदर ही आज इंडिया के कोने-कोने तक पहुंच चुका है। महात्मा गांधी तो अपने जीवन में ही बुरी तरह हार चुके थे, जब उन्होंने दूसरे कामों के अलावा ‘कांग्रेस में एकमात्र अंग्रेज’ को इसी आधार पर अपना उत्तराधिकारी बनाया! उसके बाद जो हुआ, होता रहा, वह हम देखते ही रहे हैं। अपनी भाषा-संस्कृति से प्रेम रखने वाले भारतवासियों को भ्रम-मुक्त होकर और विचारधारा के नशे से भी मुक्त होकर वैकल्पिक उपायों पर सोचना चाहिए!
साभार: इंडिया बिहाइन्ड द लेंस 
वास्तविक सूत्र:http://hindi.ibtl.in/news/exclusive/1808/article.ibtl

लूट सको तो लूट लो.

भारत स्वाभिमान मुरादाबाद                                                                  ॐ                                                                 १२-०१-२०१२
(1) इलाज के नाम पर पूरे देश में प्रति वर्ष लगभग 10 लाख करोड़ रुपये की लूट हो रही है। अनावश्यक दवा , अनावश्यक परीक्षण पर गैर जरुरी आँपरेशन का रोज खतरनाक खेल, हो रहा है।

(2) शराब, तम्बाकू, गुटखा, अफीम व चर्स आदि नशीले सेवन से देश के प्रति वर्ष लगभग 10 लाख करोड़ रुपया बर्बाद हो रहे है।

(3) विदेशी कम्पनियों द्वारा साबुन, शैम्पू, टूथपैस्ट, क्रीम, पाउडर, आचार, चटनी, चिप्स, कोकाकोला व पेप्सी आदि शून्य तकनीकी से बनी बहुत ही गैरजरुरी अनुपयोगी व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुएं बैचकर भारत से प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख करोड़ रुपये की लूट हो रही है। तथा देश का धन विदेशी लोगों के हाथों में जाने से देश आर्थिक दृष्टि से कमजोर हो रहा है।

(4) यूरिया, डी,ए,पी व अन्य हानिकारक खाद व जहरीले कीटनाशकों से एक ओर जहाँ धरती माता की कोख (खेत) व इंसान का पेट विषैला हो रहा है वहीं गो व पशुधन आधारित कृषि व्यवस्था न होने से प्रतिवर्ष लाखों गायों व अन्य पशुधन का बर्बरता के साथ कत्लखानों में वध हो रहा है। प्रतिवर्ष इन जहरीली खाद व कीटनाशकों से देश के लगभग 5 लाख करोड़ रुपये नष्ट हो रहा है।

(5) टैक्स जस्टिस नेटवर्क, ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल, प्रवर्तन निदेशालय, केन्द्रीय सतर्कता आयोग अन्य राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के अनुसार पूरी दुनिया में अब तक 11.5 ट्रिलियन डालर क्रास बार्डर ब्लैकमनी जमा है। भारतीय मुद्रा के अनुसार उसकी कीमत 518 लाख करोड रुपये है तथा इसमें से आधा 258 लाख करोड भारत के बेईमान लोगों का है। अभी भी यह लूट का सिलसिला रुका नहीं है।

प्रतिवर्ष 1.6 ट्रिलियन डाँलर अभी भी देश की सीमाओं से बाहर काला धन जमा होता है। अर्थात प्रतिवर्ष अभी भी लगभग 72 लाख करोड रुपये दुनिया के बेईमान लोग अपने-अपने देशों से लूटकर दूसरे देशों में जमा करते है। अत: ये भ्रष्टाचार व काला धन मात्र राष्ट्रीय ही नही एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है। इस 72 लाख करोड रुपये में आधा रुपये एशियन देशों का है और इसमें भी आधा अर्थात 18 लाख करोड रुपये भारत का प्रति वर्ष विदेशी बैंकों में जमा हो रहा है। इस धनराशि को यदि महीने व दिनों में विभाजित करें तो प्रतिमाह 1 लाख 50 हजार करोड, प्रतिदिन 4931.5 करोड, प्रतिघंटा 206 करोड एवं प्रति मिनट 3 करोड 42 लाख रुपये की लूट हो रही है। नक्सलवाद, माओवाद, आंतकवाद, गरीबी व बेरोजगारी आदि समस्त ज्वलंत सम्स्याओं व चुनौतियों का मूल कारण भ्रष्टाचार, काला धन एवं पक्षपात की गलत नीतियाँ एवं व्यवस्थाएं भी है व बेरोजगारी आदि समस्त ज्वलंत समस्याओं व चुनौतियों का मूल कारण भ्रष्टाचार, काला धन एवं पक्षपात की गलत नीतियाँ एवं व्यवस्थाएं भी है।

जहाँ एक ओर देश के लोग ईमानदारी से मेहनत करके देश के विकास में लगे है और प्रति वर्ष 50 से 60 लाख करोड की जी.डी.पी, देकर देश को ताकतवर बना रहे है वहीं दूसरी और हमारी घटिया सोच, गलत नीतियों व भ्रष्टाचार पर अंकुश न होने से देश का लगभग 50 लाख करोड रुपये प्रतिवर्ष बेरहमी व बेदर्दी से लूटा जा रहा है व देश का विनाश हो रहा है और हमारे अपने घर के 5 लाख रुपये लूटने, नष्ट या बर्बाद होने पर हमे कितता कष्ट होता है।

हम 120 करोड देशभक्त, जागरुक-संवेदनशील भारतीयों के होते देश का प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख करोड रुपये लुटता रहता है और हम मौन होकर यह सब देख रहे इससे बडी शर्म, अपमान या बेबसी की बात और क्या हो सकती है? इस लूट के लिए जिम्मेदार कौन? समाज के ताकतवर बडे लोग, चाहे वह बडे डाक्टर्स, हाँस्पिटल्स हो, या फिर बडे व्यापारी, बडे अधिकारी, पर सबसे ज्यादा जिम्मेदार है बडे नेता जिनके हाथों में इस देश की सर्वोच्च सत्ता व शक्ति है।

भ्रष्टाचार के लिए तो वे 100 फीसदी सीधे जिम्मेदार ही साथ ही दुसरी लूट में भी उनकी भागीदारी है। चाहे बडे हाँस्पिटल्स हो, दवा निर्माता कम्पनियाँ, हो या फिर शराब तम्बाकू या अन्य नशा बनाने वाली कम्पनियाँ हों अथवा विदेशी कम्पनियां जिनके साथ कुछ रसूखदार ताकतवर नेताओं की पार्टनरशिप होती और कई बार तो वे सीधे तौर पर खुद ही मालिक होते हैं।
साभार: 
वास्तविक सूत्र:

दैनिक जीवन में उपयोगी स्वदेशी सामान की सूची

उत्पाद 
विदेशी 
स्वदेशी 
टूथपेस्ट/ दन्त मंजन 
अधिकतर टूथपेस्ट हड्डियों के चूरे से बनते हैं.
 कोलगेट,हिंदुस्तान लीवर(क्लोजअप, पेप्सोडेंट,
ऐम, सिबाका), अक्वाफ्रेश, 
एमवे,  फोर्हेंस,ओरलाबी,क्वांटम आदि.
दन्तकान्ति,दंतमंजन(पतंजलि), एमडीएच, 
विको वज्रदंती, बैद्यनाथ, गुरुकुल फार्मेसी, चॉईस,
नीम, एंकर, मिस्वाक, बबूल, प्रोमिस आदि.
टूथब्रश 
कोलगेट, क्लोजअप, पेप्सोडेंट, अक्वाफ्रेश, सिबाका आदि
पतंजलि टूथब्रश, प्रॉमिस,अजय,अजंता,मोनेट,
रॉयल,क्लासिक,डॉ. स्ट्राक आदि
नहाने का साबुन 
हिंदुस्तान लीवर ( लक्स, लिरिल, लाइफ बॉय, लेसंस,
 डेनिम, कैमे,डव, रेवलान, पेअर्स, रेक्सोना, ब्रीज, हमाम, ओ के) 
पोंड्स, डिटोल, क्लीर्सिल, पामोलिव, एमवे,जोन्सन बेबी आदि

काया कांति(पतंजलि), निरमा, मेडिमिक्स, नीम, नीमा, 
जेसमीन, मैसूर, सेंदल, कुटीर, सहारा, हिमानी, ग्लिसरीन, गोदरेज,
(सिंथोल, फेयर ग्लो, शिकाकाई, गंगा), विप्रो, संतूर आदि
शैम्पू 
हिंदुस्तान लीवर( लक्स, क्लिनिक प्लस, सनसिल्क,
रेव्लान, लक्मे) प्रोक्टर एंडगैम्बल( पैंटीन, मेडिकेयर), पोंड्स ओल्ड स्पाइस, शावर टू शावर, हेड एंड शोल्डर, जोन्सन बेबी आदि 
केश कांति(पतंजलि), विप्रो, पार्क अवेन्यु, स्वस्तिक, 
आयुर हर्बल, केश निखर, हेयर एंड केयर, नाइसिल अर्निका, वेलवेट, डाबर वाटिका, बजाज, नाइल, गोदरेज आदि 
कपडे व बर्तन धोने
के साबुन पाउडर व
नील 
हिंदुस्तान लीवर( सर्फ़, ऋण, सनलाइट, व्हील, ओके, विम)
 एरियल,  चैक, हेंको, रिविल, एमवे, क्वांटम.
 ऊनी कपड़ो के लिए: वूल वाश, ईजी,
नील: रोबिन ब्लू, टीनोपाल, स्काईलार्क आदि 
टाटा शुद्ध, नीमा, मोदी, केयर, सहारा, स्वस्तिक, विमल, हिपोलिन, फेना, ससा, टी सिरीज़, डॉ. देत, घडी
 ऊनी कपड़ो के लिए: जेंटिल.
नील: उजाला, रानीपाल, निरमा, चमको, दीप आदि 
शेविंग क्रीम 
ओल्ड स्पाइस, पामोलिव, पौंड्स, जिलेट, इरास्मिक, डेनिम, यार्दले आदि
पार्क एवेन्यू, प्रीमियम, वीजोन, इमामी, बलसारा, गोदरेज, नीविया आदि 
शेविंग ब्लेड
जिलेट(7 ओ'क्लोक, इरास्मिक), विल्मेन, विल्तेज आदि
टोपाज, जेलेंट, सुपरमेक्स, लेज़र, अस्कवार्य, सिल्वर प्रिंस आदि 
क्रीम, पाउडर व
सोंदर्य प्रसाधन 
हिंदुस्तान लीवर( फेयर एंड लवली, लैक्मे, डेनिम, रेव्लों) प्रोक्टर एंड गैम्बल( ओले, क्लीयेर सिल, क्लीयेरटन), चार्मिस, पांड्स, ओल्ड स्पाइस, डेटोल, नाइसिल, चार्ली, जोंसन बेबी आदि  
काया कांति अलोवीरा जेल, कयाकान्ति, कांतिलेप(पतंजलि), बोरोसिल, आयुर, इमामी, विको, बोरोप्लस, बोरोलीन, हिमानी गोल्ड, नाइल, लेवेंडर, हेयेर & केयेर, वेलवेट बेबी आदि
रेडीमेड वस्त्र 
रैंगलर, नाइक, ड्यूक, अडिदास, न्यूपोर्ट, प्यूमा आदि
केम्ब्रिज, पार्क एवेन्यू, ओक्ज़ेम्बर्ग, बोम्बे डाइंग, रफ एंड टफ, ट्रिगर जींस आदि
घडी 
राडो, रोलेक्स, स्विसको, सीको आदि
टाईटन, एच.ऍम.टी., प्रेस्टीज, अजंता आदि 
पेन, पेन्सिल 
पारकर, निकल्सन, रोटोमैक, स्विस एयर, ऐड्जेल, राइडर, मित्सुबिशी, फ्लेयर, युनिबाल, पायलट, रोलगोल्ड आदि  
कैमल, किन्ग्सन, शार्प, सेलो, विल्सन, टूडे, नटराज, एम्बेसेडर, लिंक, मोंटेक्स, स्टीक, संगीता, लक्सर, अप्सरा आदि.    
शीतल पेय 
कोका कोला(कोक, फेंटा, स्प्राईट, थम्सअप, लिम्का), पेप्सी(लहर, ७ अप, मिरिंडा, स्लाइस) टीम, सिट्रा, क्रश, मेक्डोवल  
गुलाब शरबत, बादाम शरबत (पतंजलि) , दूध लस्सी, छाछ, जूस, निम्बू पानी, नारियल पानी, शेक, ठंडाई, जलजीरा, रूहअफजा, रसना, फ्रूटी, गोदरेज, जम्पिन आदि 
चाय व कॉफ़ी 
चाय: लिप्टन,(टाइगर, ग्रीन लेबल, येलो लेबल, चीयर्स), ब्रुक बोंड( रेड लेबल, ताजमहल), गोड्फे फिलिप्स, पोलसन, गुडरिक, सन राइज, 
काफी: नेस्ले, नेस्कैफे, रिच्ब्रू.  
चाय: दिव्य पेय(पतंजलि) टाटा, ब्रह्म पुत्र, असम, गिरनार 
काफी: ऍम.आर., इंडियन कफे  
शिशु आहार व दूध
पाउडर
नेस्ले( लेक्तोज़ं, सेरेलक, नेसटम, एल.पी.ऍफ़., मिल्क मेड, नेस्प्रे, ऐवरीडे, गल्ताको) ग्लेक्सो(फेरेक्स) आदि  
शहद, दालों का पानी, उबले चावल, फलों का रस. अमूल, इंडाना, सागर, तपन, मिल्क केयर आदि 
आइसक्रीम 
अधिकतर आइसक्रीमो में जानवरों की आंतो की परत होती है. वाल्स, क्वालिटी, डोलाप्स, कड्बरी(फैरेक्स) आदि 
घर की बनी आइसक्रीम, कुल्फी, अमूल, वाडीलाल, मिल्क फ़ूड आदि 
नमक 
अन्नपूर्णा, कप्तान कुक(हिंदुस्तान लीवर), किसान (ब्रुक बोंड), पिल्सबरी आदि
अंकुर नमक, सिंध नमक(पतंजलि), लो-सोडियम व आयरन-४५, अंकुर, टाटा, सूर्य, ताज़ा, तारा
आलू चिप्स एवं
नमकीन
अंकल चिप्स, पेप्सी( राफल्स, हास्टेस), 
फन मंच आदि  
बिकानो, हल्दीराम, घर में बने चिप्स, बिका जी, एवन आदि   
टमाटर सॉस, फ्रूट जैम
नेस्ले, ब्रुक बोंड(किसान), मैगी, ब्राउन एंड पालसन आदि  
फ्रूट जैम, ऐपल जैम, मिक्स जैम (पतंजलि), घर में बना सौस, इंडाना, प्रिया, रसना आदि 
बिस्किट, चाकलेट 
अधिकतर चोकलेट में आर्सेनिक नामक जहर होता है. कैडबरी(बोर्न वित,५ स्टार), लिप्टन, हार्लिक्स, नुट्रीन, इक्लेयर्स आदि 
गुड, मूंग फली बादाम ज्यादा स्वास्थ्य प्रद है, आवला कैंडी, बेल कैंडी, बिस्किट, कैंडी(पतंजलि). ब्रितानिया, परले, बेक्मेंस, क्रीमिका, शाग्रीला, अमूल, रावल गाँव आदि  
पानी 
अक्वा फिना, किनले, बैली, प्योर लाइफ, इवियाँ, सैन-पैलेग्रीमो, पैरियेर आदि 
घर का उबला साफ़ पानी, येस गंगा, हिमालय, कैच, रेल नीर, बिसलरी आदि 
टॉनिक 
बूस्ट, पोलसन, बोर्नविटा, हार्लिक्स, कोम्प्लन, स्पर्ट, प्रोटिनेक्स आदि
बादाम पाक, च्यवन प्राश,  अमृत रसायन(पतंजलि), न्युट्रामॉल ,मल्टोवा 
घी व खाद्य तेल 
नेस्ले का घी, डालडा, आई.टी.सी., हिंदुस्तान लीवर के सभी ब्रांड 
परम घी, अमूल घी, गाय का देशी घी, सरसों का तेल(पतंजलि)

नोट: 
१. यद्यपि सूचि प्रकाशन में पर्याप्त सावधानी रखी गई है तथापि किसी भी नवीन जानकारी से हमें अवगत अवश्य करिए तथा यदि भूलवश कोई गलती हो गयी हो तो कृपया अवगत करिए.
२. आप जहाँ भी रहते हैं, उसके आस-पास ग्रामीणों एवं लघु उद्योगियो द्वारा आपके दैनिक जीवन की कई वस्तुए बनाई जाती है. आप प्राथमिकता के आधार पर उनका प्रयोग कर गाँव को स्वावलंबी बनाये. 

कृपया कमेंट्स हिंदी में दें, इस बॉक्स का प्रयोग करें:हिंदी टाइप रायटर

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